यदि सर रूप में कहे तो वैराग्य का सारा दर्शन छिपा है एस एक शब्द में. सृस्त्ती में सबसे ज्यादा व्यापक शब्द है परिवर्तन....
जो कल था वो आज नहीं है , जो अबी है वो अगले पल नहीं रहेगा और जो आज है वो परिवर्तित होकर कुछ और हो जायेगा. ब्रह्म्मंद की हर एक छोटी बड़ी इकाई क्षण प्रति क्षण परिवर्तित हो रही है......
क्या विश्व-क्या ब्रह्म्मंद, क्या सूर्य-क्या महासूर्य, क्याग्रह-क्या उप्प्ग्रह, क्या जड़-क्या चेतन, क्या चार-क्या अचर, क्या प्र-क्या अपरा, क्या पदार्थ-क्या प्रकृति, क्या अनु-क्या परमाणु, क्या शवस-क्या प्रश्व्न्स , क्या सृजन-क्या विनाश, क्या व्यस्ती क्या समस्ती, क्या द्वीप-क्यामाहद्विप, क्या दरिया-क्या सागर, क्या हवा-क्या पानी, क्या जीवन -क्या मरण, क्या व्यक्ति-क्या समाज , क्या विधि-क्या विधान, क्या अंत- क्या आरम्भ, क्या सुख-क्या दुःख, क्या हंसी- क्या ख़ुशी, क्या गरीब-कुआ आमिर, क्या छोटा-क्या बड़ा, क्या बुढ़ापा-क्या जवानी, क्या सक्रिय-क्या निष्क्रिय, क्या मधुर-क्या तिक्कता, क्या रूप-क्या कुरूप, क्या क्रिया-क्या प्रतिक्रिया, क्या मित्रता-क्या शत्रुता. क्या आंधी-क्या तूफ़ान, क्या हर्ष-क्या विषद, क्या आकर्षण-क्या विकर्षण, क्या साज-क्या संभल, क्या सघन-क्या विरल, क्या रस- क्या नीरस, क्या पूरब-क्या पच्छिम, क्या उत्ते-क्या दक्षिण... जो कुछ भी दृश्य -अदृष्ट है एस जगत में वह क्षण-प्रतिक्षण परिवर्तित हो रहा है . जो एक क्षण पहले था वह एक क्षण बद्नाही रहेगा, सतत गतिवान और परिवर्तनशील है यह सृष्टि और इसके अंग-अवयव.........