Tuesday, 6 December 2011










संसद का शीत कालीन सत्र प्रगति पर है--- और एक बार फिर अन्ना के आन्दोलन की हवा फिजाओं में छाना शुरू ओ गई है---उन्होंने सरकार को फिर एक बार चेताया था की अगर जन लोकपल लागु नहीं हुआ तो एक बार फिर होगा जन आन्दोलन के खिलाफ अनशन
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चरित्रगत विषय है भ्रष्टाचार

 ”भ्रष्टाचार का स्वरूप इतना अमूर्त व अवधारणा इतनी व्यापक है कि इसे सिर्फ अन्ना के सरकारी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तक सीमित नहीं रखा जा सकता क्योंकि भ्रष्टाचार एक चरित्रगत विषय है-”

 अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं, अन्ना नही ये आंधी है दूसरा महात्मा गांधी है व अन्ना बिन पानी कसाब को बिरयानी। ये चंद लाइने भ्रष्टाचार में आकंठ डूब चुके देश और इस महामारी से त्रस्त देश के सुधी नागरिकों द्वारा भ्रष्टाचार के विरोध में मुखरित उस आन्दोलन की बानगी हैं,  जिनसे पिछले दिनों पूरा देश गुंजायमान रहा। जो कि भ्रष्ट तंत्र से त्रस्त देश के जागरूक नागरिको के परिवर्तनकारी उजास से उपजी हैं।
       आखिर हो भी क्यों न, वर्षों से उनके दिलो में जड जमाये भ्रष्टाचार के खत्में की तड़प आज अन्ना हजारे जैसा दृढ़-अवलम्बन पाकर बाहर निकल आयी है। परिणामस्वरूप राजधानी दिल्ली से लेकर देश के विभिन्न गांव-कस्बों व नुक्कड चैराहों तक अन्ना के समर्थन व भ्रष्टाचार के विरोध में जुलूसों व अनशन के चले सिलसिलों का पूरा देश गवाह बना। जिसे देश के छोटे बच्चों से लेकर युवाओं तक की भागीदारी कर सफल बनाया।
   
वाकई सलाम करने लायक है अन्ना। जीवन के आखिरी पडाव व उम्र के 74वें वसन्त में पहुंचे सेना के रिटायर्ड फौजी किशन बाबूराव उर्फ अन्ना हजारे को इस उम्र में बूढ़ा कहना उनके देश के प्रति जवां जज्बे की तौहीन करना होगा। जिस उम्र में लोग नाती-पोतों के साथ वक्त बिताने की इच्छा रखते हैं उस उम्र में अन्ना ने जिस जुनून व मजबूत इरादों के साथ भ्रष्टाचार रूपी दानव और पूर्व में सरकारी लोकपाल के सहारे भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रही सरकार से लोहा लिया है वह देश के बांके जवानों को भी दांतो तले अंगुली दबाने पर मजबूर कर देता है। अपने देश के प्रति अन्ना का चट्टानी जज्बा देखकर लोग उन्हें योगी, सन्त और महात्मा जैसी विभूतियों से अलंकृत करने लगे हैं।
                         
अन्ना और उनकी टीम ने लीड लेकर मुल्क को भ्रष्टाचार के दलदल से निकलने की एक उम्मीद थमा दी है और खुद उत्प्रेरक बनकर भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगो के असंतोष को मुखर किया है। हमें अन्ना हजारे, किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल जैसे क्रान्तिकारियों को नमन करना ही होगा जिन्होंने सरकारी खजाने की बंदरबांट के विरूद्ध अहिंसक आंदोलन छेड़कर सरकार को भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलित जनभावनाओं के आगे झुकने पर मजबूर कर दिया।

फिलहाल, 16 अगस्त से शुरू अन्ना के अनशन के ठीक 12वेें दिन 27 अगस्त को लोकपाल मसले पर अन्ना हजारे की तीन प्रमुख मांगों को अन्ततः संसद की मंजूरी मिल गई। सरकार की तरफ से वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा लाया गया प्रस्ताव पहले राज्यसभा फिर लोकसभा में ध्वनिमत से पारित हुआ। इसी के साथ अन्ना की तीन प्रमुख मांगों -सिटीजन चार्टर, राज्यों में लोकायुक्तों का गठन और कनिष्ठ अधिकारियों को लोकपाल के दायरे में लाने पर लगभग सभी दलो की सहमति के बाद यह प्रस्ताव संसद की स्थायी समिति के पास भेज दिया गया है। संसदीय स्थायी समिति अब उसे व्यवहार्यता, क्रियान्वयन क्षमता और संवैधानिकता के आलोक में देखेगी और निर्णय लेगी।

संसद द्वारा उठाये गये इस कदम के बाद अन्ना ने गत 28 अगस्त को शहद और नारियल पानी के शर्बत से अपना अनशन तोड़ दिया है। हालांकि उन्होंने व्यवस्था को चुनौती देते हुए यह जरूर कहा, कि भ्रष्टाचार के खात्मे के लिये यह लड़ाई का अंत नहीं बल्कि एक शुरूआत है और इस कड़ी में अगला कदम चुनाव सुधार की प्रक्रिया से संबंधित होगा।

मगर वर्तमान परिदृश्य और घटनाक्रमों से परे भी बहुत कुछ है जो हमें इन सबसे इतर सोचने को मजबूर करता है, कि क्या महज सरकारी बिल के पास हो जाने से देश में महाव्यापक भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से अंकुश लगाया जा सकता है ? शायद हाँ, पर आंशिक रूप से। क्योंकि अन्ना का आंदोलन सिर्फ सरकारी भ्रष्टाचार के विरूद्ध लामबंद और यहीं तक सीमित है। जो कि एकांगी है, और देश में भ्रष्टाचार जैसे महाव्यापक शत्रु की संपूर्ण व्याख्या नहीें करता।
                      भ्रष्टाचार का स्वरूप इतना अमूर्त व अवधारणा इतनी व्यापक है कि इसे सिर्फ अन्ना के सरकारी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तक सीमित नहीं रखा जा सकता क्योंकि भ्रष्टाचार एक चरित्रगत विषय है। किसी व्यक्ति का चरित्र ही वह पैमाना है जिससे उसकी नीयत का पता चलता है। जिसका चरित्र जितना पवित्र और प्रखर होगा वह उतना ही दृढ़ और नेकनीयत और जिसका चरित्र जितना ही निर्बल और अपवित्र होगा वह उतना ही कमजोर व बदनीयत होगा। यह चरित्र ही है जो व्यक्ति की नीयत और आचरण को प्रभावित करता है।  

चूंकि अन्ना का अनशन सरकारी अर्थ में पारदर्शिता के प्रति ही है और इससे समाज जैसे व्यापक क्षेत्र अछूते रह गये हैं जबकि अर्थ -अभीप्सा की छीना-झपटी में सबसे अधिक प्रभावित समाज ही हुआ है फिर चाहे वह परिवार, रिश्ते अथवा नाते ही क्यों न हों। क्योंकि जो कार्य क्षेत्र में ईमानदार है वो रिश्तों में भी ईमानदार जरूर होगा।
               अन्ना का अनशन इसलिये भी एकांगी है क्योंकि अन्ना को सबसे ज्यादा लोकप्रिय और जनव्यापी बनाने वाले मीडिया, कार्पोरेट सेक्टर , अंतर्राष्ट्रीय और गैर सरकारी संगठनों के भ्रष्टाचार को लोकपाल बिल में लाने की बात नहीें की जा रही है।
                     
 अगर हमें देश और समाज से भ्रष्टाचार को पूर्ण रूप से खत्म करना है तो देश को एक और नई क्रांति की जरूरत होगी जो लोगों की नीयत में परिवर्तन के प्रति जिम्मेदार होगी। मैं पूंछना चाहूंगा उन तमाम देश वासियों से जो भ्रष्टाचार मुक्त देश की वकालत करते हैं, कि क्या हम इस क्रांति और खुद को बदलने के लिये तैयार हैं?

Monday, 23 May 2011

यदि सर रूप में कहे तो वैराग्य का सारा दर्शन छिपा है एस एक शब्द में. सृस्त्ती  में सबसे ज्यादा व्यापक शब्द है परिवर्तन....
 जो कल था वो आज नहीं है , जो अबी है वो अगले पल नहीं रहेगा और जो आज है वो परिवर्तित होकर कुछ और हो जायेगा. ब्रह्म्मंद की हर एक छोटी बड़ी इकाई क्षण प्रति क्षण परिवर्तित हो रही है......
क्या विश्व-क्या ब्रह्म्मंद, क्या सूर्य-क्या महासूर्य, क्याग्रह-क्या उप्प्ग्रह, क्या जड़-क्या चेतन, क्या चार-क्या अचर, क्या प्र-क्या अपरा, क्या पदार्थ-क्या प्रकृति, क्या अनु-क्या परमाणु, क्या शवस-क्या प्रश्व्न्स , क्या सृजन-क्या विनाश, क्या व्यस्ती क्या समस्ती, क्या द्वीप-क्यामाहद्विप, क्या दरिया-क्या सागर, क्या हवा-क्या पानी, क्या जीवन -क्या मरण, क्या व्यक्ति-क्या समाज , क्या विधि-क्या विधान, क्या अंत- क्या आरम्भ, क्या सुख-क्या दुःख, क्या हंसी- क्या ख़ुशी, क्या गरीब-कुआ आमिर, क्या छोटा-क्या बड़ा, क्या बुढ़ापा-क्या जवानी, क्या सक्रिय-क्या निष्क्रिय, क्या मधुर-क्या तिक्कता, क्या रूप-क्या कुरूप, क्या क्रिया-क्या प्रतिक्रिया, क्या मित्रता-क्या शत्रुता. क्या आंधी-क्या तूफ़ान, क्या हर्ष-क्या विषद, क्या आकर्षण-क्या विकर्षण, क्या साज-क्या संभल, क्या सघन-क्या विरल, क्या रस- क्या नीरस, क्या पूरब-क्या पच्छिम, क्या उत्ते-क्या दक्षिण... जो कुछ भी दृश्य -अदृष्ट है एस जगत में वह क्षण-प्रतिक्षण परिवर्तित हो रहा है . जो एक क्षण पहले था वह एक क्षण बद्नाही रहेगा, सतत गतिवान और परिवर्तनशील है यह सृष्टि और इसके अंग-अवयव.........


Wednesday, 4 May 2011

parivartan..ek vyakhya,

साढ़े पञ्च अक्षरी और करीब एह इंच जगह घेरने और मुश्किल से
तीन से पञ्च सेकंड लेने वाला यह शब्द जेहेन में आते ही कुछ नए पण का हल्का सा स्पंदन दे देता है . पर अगर एस जेहेन में उठने वाली  नयेपन की  एस तरंग पर कुछ देर ठहरकर सोंचा जाये तो एस साढ़े पञ्च अक्षरी शब्द में व्यष्टि ऐ समष्टि तक का न केवल दृश्य जगत बल्कि मानवी पहुँच से दूर अदृश्य, अलओकिक अत्यंत रहस्यमय और गोपनीय ब्रह्म्मंद तक का दृश्य -  अदृश्यसारा ज्ञान समेटे है. व्यक्ति से समष्टि तक का अद्भुत ज्ञान समेटे यह शब्द तरंग अगर भूले   भटके भी  इंसानी जेहेन से टकरा जाये तो उस टक्कर से उत्पन्न तरंग अपर अगर गौर फरमाया जाये तो मशः अल्लाह एस इंसानी संसार की फितरत ही बदल जाये...

Thursday, 25 November 2010

परिवर्तन का दर्शन ..

 Changing is the rule of nature......
                                                     परिवर्तन  प्रकृति  का शाश्वत नियम है.. स्कूल  के दिनों में पढ़ी यह  उक्ति , जो हर क्षण बदल रहे प्रकृति, समाज और जीवन के बारे में एक स्पष्ट दर्शन दे जाती है  दिल  की अंतड़ियों में इतनी गहरी समां गई है की  इनका प्रयोग  तब से लेकर ग्रेजुएशन तक के  ने केवल साहित्तियिक पेपरों में बल्कि जिंदगी की उलझाने सुल्घते बखत गाहे - बगाहे हो ही जाता है \
                         हृद्यांचल के किसी गहरे कोने में जड़ जमाये बैठा यही संस्कार विचारों का स्पंदन पाकर आज फिर से झंकृत हो उठा है .
       बचपनसे ही एस कच्चे मन ने प्रकृति और इसके सहचरों में होने वाले नित नए बदलावों के बारे में बड़ी संजीदगी से सोचना शरू कर दिया था. इन बदलावों के दौरान पहली स्थिति के विछोह से उत्त्पन्न हुई पीड़ा लम्बे समय तक दिल में एक नश्तर बन चुभती रहती थी और ब्याज में दे जाती थी कभी न ख़तम होने वाली गहरी टीस . सो इस  कमजोर मन को एक ही स्थिति  से चिपके रहने की आदत सी हो गई थी शायद और परिवर्तन के प्रति दुराग्रह भी.
                    शब्दों के माया जल से अनजान  यह बल मन तब मासूमियत के नाते बदलाव  के दौर के  इन  रूमानी और कुछ  कुछ  रूहानी अहसासों  को  शब्दों के धागे में गूंथने में अक्षम था .
                                                                                                                          पर आज जब पत्रकारिता का क , ख , ग पढ़ मीडिया जगत में कदम रख ही दिया है तो ब्लॉग्गिंग के इस सम्मोहक  वर्चुअल संसार में अब तक के बचपने और सयानेपन के कुछ खट्टे-मीठे अहसासों को शब्दों के सीमित धागे में पिरोने  की एक छोटी सी कोशिश है  यह --
                              परिवर्तन...