Thursday, 25 November 2010

परिवर्तन का दर्शन ..

 Changing is the rule of nature......
                                                     परिवर्तन  प्रकृति  का शाश्वत नियम है.. स्कूल  के दिनों में पढ़ी यह  उक्ति , जो हर क्षण बदल रहे प्रकृति, समाज और जीवन के बारे में एक स्पष्ट दर्शन दे जाती है  दिल  की अंतड़ियों में इतनी गहरी समां गई है की  इनका प्रयोग  तब से लेकर ग्रेजुएशन तक के  ने केवल साहित्तियिक पेपरों में बल्कि जिंदगी की उलझाने सुल्घते बखत गाहे - बगाहे हो ही जाता है \
                         हृद्यांचल के किसी गहरे कोने में जड़ जमाये बैठा यही संस्कार विचारों का स्पंदन पाकर आज फिर से झंकृत हो उठा है .
       बचपनसे ही एस कच्चे मन ने प्रकृति और इसके सहचरों में होने वाले नित नए बदलावों के बारे में बड़ी संजीदगी से सोचना शरू कर दिया था. इन बदलावों के दौरान पहली स्थिति के विछोह से उत्त्पन्न हुई पीड़ा लम्बे समय तक दिल में एक नश्तर बन चुभती रहती थी और ब्याज में दे जाती थी कभी न ख़तम होने वाली गहरी टीस . सो इस  कमजोर मन को एक ही स्थिति  से चिपके रहने की आदत सी हो गई थी शायद और परिवर्तन के प्रति दुराग्रह भी.
                    शब्दों के माया जल से अनजान  यह बल मन तब मासूमियत के नाते बदलाव  के दौर के  इन  रूमानी और कुछ  कुछ  रूहानी अहसासों  को  शब्दों के धागे में गूंथने में अक्षम था .
                                                                                                                          पर आज जब पत्रकारिता का क , ख , ग पढ़ मीडिया जगत में कदम रख ही दिया है तो ब्लॉग्गिंग के इस सम्मोहक  वर्चुअल संसार में अब तक के बचपने और सयानेपन के कुछ खट्टे-मीठे अहसासों को शब्दों के सीमित धागे में पिरोने  की एक छोटी सी कोशिश है  यह --
                              परिवर्तन...